महर्षि का स्मारक बनाने की प्रक्रिया तेज

Aryavirdal

 

टंकारा जन्म शताब्दी के समय टंकारा में महर्षि दयानन्द का भौतिक स्मारक बनाने का प्रश्र्न उपस्थित हुआ था | विभिन्न प्रस्तावो में से भौतिक स्मारक बनाने की प्रक्रिया चलाने के लिए टंकारा में आर्यसमाज स्थापित की जाय व उसीके द्वारा स्मारक निर्माण की आगे की कार्रवाई चलाई जाय | डॉ. मथुरादासजी ने महर्षि का जन्मगृह खरीदकर घंटा घर, भवन आदि बनाना चाहा, पर वह मकान महर्षि के भाजने के वंशज के अधिकार में था, और उनमे आर्य विचार नहीं थे, राशि भी अधिक माँगी | अत: सौदा नहीं हो सका | (जिसे बाद में एक धनवान व्यापारी श्री चकुभाई सुंदरजी भम्मर ने अपने परिवार के लिए खरीद कर नया भवन ‘वसंत निवास’ के नाम से निर्मित किया | जिस का थोडा सा हिस्सा १९८० के दसक में स्व. चकुभाई सुन्दरजी के सुपुत श्री कानजी भाई ने टंकारा ट्रस्ट को दान में दिया, जहाँ आज ऋषि जन्म घर – चित्रावली का संचालन होता है) इस के बाद अन्य स्थानों को देखा गया | मोरबी के महाराजा ने टंकारा रेलवे स्टेशन को पास ( टंकारा में सन् १९६५ तक नेरोगेज रेल का आवागमन होता था) भवन बनाने के लिए भूमि प्रदान करने का वचन दिया, परंतु कुछ कारणों से यह संभव न हो सका |

आर्य मिशनरी पं. श्री कृष्ण शर्मा जो कि एक पत्रकार थे और एक पत्रिका का संचलन करते थे, टंकारा आये | आर्यसमाज टंकारा के सदस्य बने, मंत्री पद का कार्यभार भी संभाला | ऋषि स्मारक निर्माण में उन्होंने प्रयास शुरू किये | सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा को प्रेरित किया | दयानन्द साल्वेशन मिशन से भी बातचीत चलाई | टंकारा में आर्यसमाज है, भवन नहीं, और स्मारक के लिए तो कुछ भी नहीं है | श्री गिरधरलाल महेताने मुंबई आर्यसमाज के पास प्रस्ताव रखा, परन्तु कहीं से सकारात्मक उत्तर प्राप्त नहीं हुआ | जब कहीं से सहयोग की आशा न रही तो अपने ही पैर पर खड़े हो कर इस महत्वपूर्ण कार्य को करने का प्रण ले लिया | और सन् १९३५ में महाशिवरात्रि पर आर्यसमाज मन्दिर निर्माण के लिए रु १०,०००/- (दस हजार) की सहायता की अपील की पत्रिका छपवाई | सभी स्थानों पर भेजी गई | सब से पहला दान श्री गिरधरलाल महेता ने स्वयं दे कर इसका शुभारंभ किया |

स्मारक एक सार्वदेशिक वस्तु है, और आर्यसमाज मन्दिर एकदेशीय | ये दोनों ही कार्य आर्यसमाज टंकारा ने अपनी शक्ति सीमित होते हुए भी अपने हाथ में लिए | टंकारा एक छोटा – सा कस्बा, तिन-चार परिवारों को छोड़कर कोई आर्य विचार का नहीं, ऊपर से पौराणिकता का बोलबाला | विरोधियों के स्वर ऊँचे, आर्थिक संकट आदि विपरीत परिस्थितियों का सामना करते हुए कार्य करना | तपस्या ही समझ लों | बाधाएँ आयीं, स्थानीय व बाह्य विरोध हुआ, पर निराश नहीं हुए | प्रयत्न नहीं छोडा |

सन् १९३६ में पोरबंदर के सेठ श्री नानजीभाई कालिदास महेता ने आर्यसमाज टंकारा के भवन हेतु रु. २५००/- का दान दिया | आर्यसमाज के नाम पर टंकारा में एक ईंच जमीन नहीं थी, इस दान से सर्वप्रथम एक मकान एक मुसलमान से खरीदा गया | और टंकारा में आर्यसमाज के नाम से अपनी कही जा सके एसी मिल्कत की नींव पडी |

इधर स्मारक भवन के लिए भी प्रयास जारी रहा | श्रीमती चंचलबहन पाठक और श्रीमती शान्ताबहन शाह स्मारक फंड के लिए पंजाब, राजस्थान, दिल्ली, कश्मीर आदि स्थानों के दौरे पर गईं | २४ अप्रेल १९३६ से २४ अक्तुम्बर १९३६ तक छ महिने का प्रवास किया | कुछ राशि प्राप्त हुई | सार्वदेशिक सभा के विरोध के कारण कुछ बचन मिले थे, जो राशि प्राप्त नहीं हो सकीं |

अभी तो आर्यसमाज मन्दिर को ही ऋषि का स्मारक मानकर उसके विकास के प्रयत्न थे | ख़रीदे हुए भवन के ईदगिर्द के कुछ छोटे छोटे मकान, जमीन जैसे - जैसे दान मिलाता गया, खरीदते गये | और उसमें अतिथिगृह और पुस्तकालय खंड का निमार्ण किया गया | व्यायाम शाला की प्रवुति भी शुरु हुई | अब निजी स्थान होने से उत्सव आदि कार्यक्रम रखने में सुविधा रहने लगी | महाशिवरात्रि ऋषि का बोधपर्व है, तो आर्यसमाज टंकारा का स्थापना दिन भी है | अत: इस पर्व को अधिक उत्साह से आयोजित किया जाता था | विद्वानों को विशेष आमंत्रण दिया जाता | सन् १९३८ में स्वामी शंकरानन्दजी की अघ्यक्षता में बोधपर्व मनाया गया, तो सन् १९४६ में कच्छ-काठियावाड आर्य प्रादेशिक सभाके प्रधान प्रो. अर्जुनदेव की अघ्यक्षतामें भव्यता से ऋषि पर्व बोधरात्रि मनाया गया|

श्रीमती जयाबहन देसाई (देना बेंक के मालिक श्रीमान प्राणलाल देवकरण नानजी की धर्मपत्नी) श्री गिरधरलालजी महेता की बहन थी | सन् १९४८ में टंकारा पधारी | यहाँ का कार्य देखा कार्यकर्ताओं का पुरुषार्थ देखा | आर्यसमाज भवन में पुस्तकालय खंड के निर्माण का काम अधूरा पड़ा था | उन्होंने इसे पूरा करने में यथोचित योगदान दिया | साथ ही स्मारक भवन के भव्य निर्माण के लिए टंकारा के राजकोट द्वार से बहार सवा नौ बिधा जमीन खरीद कर आर्यसमाज टंकारा को अर्पित की | श्री गिरधरलालजी महेताने योजना बनाई कि उस स्थान पर महर्षि का भव्य स्मारक बनाया जाय | जिसमें उद्यान भी हो और जिसके साथ श्रीमती जयाबहन के दिवंगत सुपुत्र सुमन का नाम जोडकर ‘महर्षि सुमन उद्यान’ नाम रखा जाय | सुन्दर बाग़, बाल क्रीडांगन, महर्षि के वचन व वैदिक सूक्तों को संगमरमर के स्तंभों पर खुदवाकर स्थापित किये जाय | इस के लिए चित्रकार-शिल्पकार श्री नानालाल टांक को भी नियुक्त किया गया | परन्तु सन् १९५२ में श्री गिरधरलालजी अवस्थ हो जाने से कार्य वहीं रुक गया |

यह सवा नौ बिधा जमीन बाद में टंकारा स्मारक ट्रस्ट की विधिवत स्थापना होने पर आर्यसमाज टंकारा ने टंकारा ट्रस्ट को इस शर्त पर दान कर दी कि वहाँ ‘महर्षि सुमन उद्यान’ बनाया जाय |

शेठ नानजीभाई महेता ने पोरबन्दर में महात्मा गांधीजी का भव्य किर्तिमान्दिर का निमार्ण करवाया है यह समाचार अर्यो ने सुने | तो श्री गिरधरलालजी महेताने आर्यों को प्रेरित किया | आर्य सन्देश – गुजराती साप्ताहिक के संपादक श्री नागजीभाई  आर्यने एक अग्रलेख लिखा की श्री नानजीभाई  ॠषि के परम भक्त है , अत : उन्हें टंकारा में भी ॠषि दयानंद का स्मारक बताना चाहिए | श्री नानजी भाई ने ॠषि स्मारक के लिए सम्मति दी | आर्यों में  उत्साह की लहर दौड़ गई | श्री गिरधरलाल महेता, श्रीमती चंचलबहन पाठक, श्रीमती शंताबहन शाह, पं. आनंद प्रियजी, श्री नागजीभाई आर्य, श्री चतुरभाई पटेल, श्री मानलाल जोषी, श्री चांदकरण शारदा आदि के प्रयास से टंकारा के ॠषि का स्मारक बन गया | इश स्मारक का अपना अलग इतिहास है | उल्लेखनीय कार्य श्री गिरधरलाल गोविन्दजी महेता का है, जिन्हों ने टंकारा के लिए अपने जीवन की आहुति दे दी | उनके इस गौरवपूर्ण कार्य के लिए उन्हें कभी भुलाया नहीं जा सकता | महर्षि दयान्द के स्मारक भवन के प्रयास कई वर्षों से चल रहे थे | जिसे आखिर में सफलता मिली | पूर्वो लिखित महानुभावों में कुछ और महानुभाव भी जूडे | जिनमें सौराष्ट्र विधानगृह के अध्यक्ष और आर्य विद्वान श्री मगनलाल भगवानजी जोषी (जामनगर) का नाम उल्लेखनीय है | आप टंकारा ट्रस्ट के ट्रस्टी भी थे | आपने मोरबी राज्य के राजपरिवार से मिलकर उनका टंकारा स्थित राजमहल ऋषि स्मारक हेतु खरीदने का प्रस्ताव रखा | तत्कालीन रु. १० लाख कीमत का राजमहल डेढ लाख में खरीद लिया गया | और दिनांक १०-१-५९ के दिन श्री मगनलाल जोशी ने ओ३म् ध्वज फहरा कर स्मारक कार्य के लिए राजप्रासाद का कब्जा लिया | जिसका शानदार उदधाटन आनेवाली महाशिवरात्रि दिनांक ५-६-७ मार्च १९५९ के दिनों में लोकसभा के अध्यक्ष श्री अनन्त शयनम् आयंगर के कर कमलों द्वारा विराट आर्य समूह की उपस्थिति में हुआ | टंकारा ऋषि स्मारक स्थापित करने आज वह स्मारक ‘महर्षि दयानन्द स्मारक ट्रस्ट टंकारा’ के नाम से ऋषि भक्त आर्यों के सहयोग से भव्यता की और अग्रेसर है |

टंकारा जन्म शताब्दी से आर्य जनता का टंकारा के प्रति ध्यानाकषिर्त हुआ | दिग्गज संन्यासियों, वानप्रस्थियों, उपदेशकों आदि का टंकारा आगमन शुरू हुआ | ऋषि का वर्तमान स्मारक (महालय) प्रारंभ होने से पूर्व इन अतिथियों के स्वागत्, सम्मान आदि का सौभाग्य आर्यसमाज टंकारा को प्राप्त हुआ है | इन में से अधिकतर इतिहास में पन्नों में अपना नाम अमर कर बिदा हो चूके हैं | टंकारा की पावन भूमि में अपना पदापर्ण करने वालों में से कुछ नाम यहाँ देकर नई पीढ़ी के लिए इतिहास ताज़ा करना हम अपना कर्तव्य समझते हैं | 

 

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