आर्यसमाज टंकारा का मध्यकाल

आर्यसमाज टंकारा की गतिविधियाँ चलाने में उस समय जिन स्थानीय आर्यों ने अपना योगदान दिया उनमें श्री बुद्धदेव पोपटलाल कंसारा, श्री मावजीभाई परमार, श्री श्यामजीभाई आर्य, श्री चतुरभाई राठोड, श्री नानालाल कालिदास टांक, श्री पं०. कृष्णदेव भीमजीभाई, श्री गोरधनदास नारणभाई पीठवा व श्री कृष्णलाल नारणभाई पीठवा के नाम उल्लेखनीय हैं ‍‌।

इन दिनों मुंबई में अपने व्यवसाय में प्रसिद्ध सेठ टंकारा निवासी श्री मगनलाल प्राणजीवन दोशी जैन धर्माविलम्बी थे, पर टंकारा दयानन्द की भूमि है इस बात का उन्हें गर्व था । आर्यसमाज के हर बड़े उत्सवों में आर्थिक सहयोग तो देते थे, अतिथियों को अपने यहाँ आवास, भोजन आदि की सुविधा भी प्रदान कर धन्यता अनुभव करते थे । उपदेशकों के कार्यक्रम भी अपने भव्य निवास स्थान ‘शान्ति निकेतन’ में रखवाते और टंकारा की जनता को निमन्त्रित करते ।

सन् १९५२ में श्री गिरधरलालजी महेता शरीर से अस्वस्थ हो गयें और मुंबई अपने परिवार के पास चले गये । अब आर्यसमाज टंकारा सारा कार्यभार श्रीमती चंचलबहन पाठक व श्रीमती शान्ताबहन शाह पर आ गया । इन माता द्वय ने स्थानीय कार्यकर्तांओं के सहयोग से सत्संग आदि प्रवृतियों को सुचारू रूप से चलाया ।

सन् १९५४ में आर्यसमाज टंकारा ने आर्यकुमार महासभा वडोदरा के सहयोग से सार्वदेशिक आर्यवीर दल का राष्ट्रीय शिविर टंकारा में आयोजित किया । २१ दिन तक चलने वाले इस शिविर में सार्वदेशिक आर्यवीर दल के सर सेनापति श्री ओम प्रकाश त्यागी, मन्त्री श्री बाल दिवाकर ‘हंस’, मुख्य प्रशिक्षक श्री रामसिंह गुरखा, मुंबई प्रदेश आर्यवीर दल के संचालक श्री एम. के. अमीन आदि पधारे । अन्य प्रान्तों से सेंकड़ो शिविरार्थी प्रशिक्षण लेने टंकारा पर्हुंचे, उनमें टंकारा के श्री दयालजी मावजी आर्य (परमार) भी शामिल हुए, जो कि आज एक अच्छे लेखक, वक्ता व चिकित्सक के रूप में प्रसिद्ध हैं ।

मुंबई प्रदेश आर्य प्रतिनिधि सभा वेद प्रचार के लिए अनेक कार्यक्रम आयोजित करती रहती थी । उनमें एक ‘आर्यधर्म परिषद्’ का कार्यक्रम घ्यानाकर्षक होता था, जो की प्रदेश में विभिन्न स्थानों पर आयोजित किया जाता था । आर्यसमाज टंकारा प्रारंभ से ही मुंबई प्रदेश आर्य प्रतिनिधि सभा के साथ संलग्न थी । अत: सन् १९५८ में ‘आर्यधर्म परिषद्’ का यजमान बनने का सौभाग्य आर्यसमाज टंकारा को प्राप्त हुआ । इस परिषद में राष्ट्रीय कक्षा के विद्वान – नेता पधारे, जिनमें श्री प्रकाशवीर शास्त्री (सांसद) श्री अलगुराय शास्त्री (अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश विधान सभा), सेठ हरगोबिन्द दास कांचवाला, श्री यशपाल परीख व श्री पं. कृष्ण शर्मा मुख्य हैं । सौराष्ट्र के राजा – महाराजा भी पधारें, जिनमें वीरपुर नरेश श्री नरेन्द्रसिंहजी, जामनगर नरेश के भाई श्री प्रतापसिंहजी, खरेडी के कुमार श्री दिग्वीजय सिंहजी व महारानी कुसुम कुंवरबा उल्लेखनीय हैं । अनेक संन्यासी, महात्मा, प्रचारक, भजनोपदेशक पधारें और ऋषि दयानन्द, वैदिक धर्म और आर्यसमाज की पावन पताका ने टंकारा की धरती और आकाश को अपने रंगो से रंग दिया, इस पूरे कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए श्री वेणीभाई आर्य व श्री भगवानदेव शर्मा कई दिन पहले टंकारा पर्हुंच चुके थे । इन्हों ने सुन्दर संचालन कर अपनी कुशलता का परिचय दिया ।

Itihas - Aryasamaj