आर्यसमाज टंकारा का वर्तमानकाल

सन् १९६४ में आर्यसमाज टंकारा की प्रधाना श्रीमती चंचलबहन का देहांत हुआ और श्री भगवानदेव शर्मा को प्रधान नियुक्त किया गया ।

श्री भगवानदेव शर्मा ने आर्य धर्म परिषद का टंकारा में संचालन किया था । कुछ वर्ष टंकारा ट्रस्ट में भी व्यवस्थापक की जिम्मेदारी संभाली थी । आप बड़े साहसी व्यक्ति थे । सन् १९५५ में गोधरा (गुजरात) में ईद के अवसर पर चार सौ गायों को कटने से बचाया था । सन् १९५६ में महागुजरात आन्दोलन में भाग लिया । १९५७ में पंजाब के हिन्दी रक्षा आन्दोलन में एक जत्था की अगुवानी की थी । सन् १९५८ में आर्य धर्म परिषद का संचालन किया उस अवसर पर २-३ सप्ताह आपको टंकारा में रहने को मिला, इस समय कुछ घटनाएँ एसी हुईं कि आपसे स्थानीय लोग बहुत प्रभावित हुए । अतः आर्यसमाज टंकारा को अपना कार्यक्षेत्र बनाने की आपसे विनती की गई । अत: सन् १९६४ से प्रधान पद का कार्यभार संभाल लिया ।

श्री भगवानदेव जी उत्साही व नीडर व्यक्ति थे, टंकारा निवासियों के प्रियपात्र थे । युवकों के लिए प्रेरणा स्त्रोत थे । आर्यसमाज टंकारा की गतिविधिर्याँ जो कुछ शिथिल सी हो गईं थीं, उनमें पुन: संसार हुआ । दैनिक सत्संग, पारिवारिक सत्संग, पर्वों को उत्साह से मनाना आदि कार्य होने लगें । योग की  कक्षाएँ शुरु की गई । व्यायाम शाला भी स्थापित हुई । छात्रावास भी शुरु किया ।

ये प्रवुतियाँ चल रहीं थीं उसे गति मिले उससे पूर्व सन १९६९ में श्री भगवानदेवजी सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा के उपमन्त्री बनें । फल स्वरूप उनको अधिक समय दिल्ली में सभा को देना पड़ा । फिर भी सन १९७९ तक स्थानीय आर्य भाइयो के आग्रह पर प्रधान पद का जिम्मा संभाला । इन दिनों मंत्रीका पद भर श्री भगवानदेवजी भाई परमार ने संभाला ।

मुख्य और समर्पित व्यक्ति की अनुपस्थिति का प्रभाव कार्यों का पड़ना स्वाभाविक है । आर्यसमाज टंकारा द्वारा संचालित कार्यों में शिथिलता आ गई , तो सन १९७० में श्री श्यामजी भाई आर्य और श्री हंसमुख परमार ने इस शिथिलता को दूर करने का बीड़ा उठाया । दैनिक सत्संग जो की बंद हो चूका था , पुनः आरंभ किया । समाज भवन के आस-पास के बच्चो, युवकों को प्रेरित किया । प्रोत्साहन- पुरस्कार खेलकूद आदि आकर्षण ने दैनिक सत्संग सब के लिए रूचि कर बन गया । प्रतिदिन सायंकालीन एक घंटे का यह क्रम-जिसमे यज्ञ, भजन, आर्यसमाज के दस नियमों का पाठ, प्रेरक कहानियाँ आदि होते- अबाधगति से चलने लगा । लगभग ३०-४० व्यक्तियों की उपस्थिति ने वातावरण को उत्साहित कर दिया ।  हमें खुशी है की सन १९७० से चल रहा यह दैनिक सत्संग सर्दी, गर्मी और बारिश हर मौसम में लगातार आज ४० वर्ष होने जा रहे है, उसी प्रकार बच्चो, किशोरों, युवकों के लिए आदर्श जीवन निर्माण का केंद्र बना है । श्री श्यामजी भाई अब हमारे मध्य नहीं रहे परन्तु श्री हंसमुख परमार अघोषित व्रत लेकर आज ४० वर्षों से दैनिक सत्संग में उपस्थित रहकर उसका संचालन करते है ।

सन १९७९ में श्री अमृतलाल मेघजी ठक्कर आर्यसमाज के प्रधान बने । अब आर्यसमाज मंदिर का और विस्तार होना प्रारम्भ हुआ । पास-पडोस की कुछ जमीन खरीदी गईं, जो आर्यसमाज भवन से लगी हुई थी । दैनिक सत्संग से अपना जीवन बदलने वाले, वैदिक धर्म के प्रर्ति जिनकी श्रद्धा बनी थी, ऐसे नये-नये युवक-गृहस्थी आर्यसमाज से जूड़ने लगे । सदस्य भी बने । अत : नई प्रवृतियाँ प्रारंभ करने के सुझाव आने लगे । विशेषकर श्री भगवानजी परमार, श्री हंसमुख परमार व श्री भगवानजी भिमाणी इन तीनों ने प्रधान जी के मार्गदर्शन में अन्य युवा व बुजुर्ग सदस्यों को साथ लेकर नये-नये प्रकल्प प्रारंभ किये ।

 

 

Itihas - Aryasamaj