महात्मा आर्यभिक्षुजी

Itihas - Aryasamaj

 

आर्यसमाज टंकारा को ऊँचा उठाने में अर्थात वर्तमान अवस्था तक पहुँचाने में प्रेरणा व प्रोत्साहन देकर हम सबका उत्साह वर्धन करने का श्रेय जाता है महात्मा आर्यभिक्षु जी को । पू. महात्माजी (बाद में स्वामी आत्मबोध सरस्वती) ने प्रति वर्ष बोधरात्रि पर्व पर टंकारा आने का व्रत लिया था । लगभग ५० वर्ष तक आजीवन यह व्रत निभाया । अर्थात् जीवन के अंतिम वर्ष तक टंकारा ट्रस्ट और आर्यसमाज टंकारा के बोधरात्रि पर्व के कार्यक्रम में उपस्थित रह कर अपनी वक्तृता से ऋषिभक्तों को लाभान्वित करते रहें ।

आर्यसमाज टंकारा के प्रति आपका विशेष स्नेह था । मानों कि इस समाज को आपने गोद लिया था । यहाँ पर बच्चों और युवकों द्वारा होती आर्यसमाज कि सेवा से आप प्रसन्न होते थे । सन् १९८० से समाज भवन का विस्तार होना प्रारंभ हुआ जो आपकी प्रेरणा का फल है । आप स्वयं दान देते और औरों से दिलवाते । आपने देखा कि इस समाज में यज्ञशाला नहीं है, तो स्वयं ने एक राशि दान देकर यज्ञशाला का निर्माण करवाया । आज इसी यज्ञशाला में दैनिक यज्ञ-सत्संग होता है । पू. महात्माजी ने इस यज्ञ कि ज्योति निरंतर जलती रहे इस हेतु एक राशि आर्यसमाज टंकारा के नाम अपना निवास स्थान ज्वालापुर में स्थिर कोष में रख दी । ‘श्री गिरधरलाल गो. महेता प्रवेश द्वार’ भी महात्माजी कि प्रेरणा से बना ।

आर्यसमाज टंकारा के पालक - पिता का कर्तव्य निभाकर आप इस संसार से बिदा हो गये, पर आपका काम व नाम आज भी इस समाज के कण – कण में गुंज रहा है ।