श्री श्यामजीभाई आर्य

 Aryasamaj

 

आर्यसमाज टंकारा की स्थापना के पश्चात उसकी नींव मजबूत करने में जिनका योगदान है; उनमें श्री श्यामजीभाई आर्य का स्थान ऊँचा है । पिताजी मावजीभाई करांची से आर्यसमाज के क्रांतिकारी विचार लेकर आये थे । पुत्र श्यामजीभाई ने उन विचारों को तुरन्त अपने जीवन में धारण कर लिए । तत्कालीन सामाजिक परिस्थिति सुधारवादी विचारों को पचाने में सक्षम नहीं थी । सामाजिक कुरिवाज व धार्मिक अन्धविश्वासों का बाजार गर्म था । परन्तु श्यामजीभाई ने किसी की परवाह नहीं की । आर्यसमाज का प्रचार कार्य करना, उपदेशकों को बुलाकर उनसे प्रचार करवाना कठिन होते हुए भी कराते रहै ।

उनका कपडे सीनेका व्यवसाय था । दलित (हरिजन) वर्ग को अछूत मानकर उनसे व्यव्हार करने का कोई साहस नहीं करता था, परन्तु श्यामजीभाई ने अछूतों के साथ बैठने–उठने और लेन-देन में कोई एतराज नहीं जताया । जातिवादी संगठन ने इस कारण उनको जाति संगठन से बहिष्कृत करने तक की धमकी दी परन्तु परवाह नहीं की । अडिग रहे, जिसका परिणाम यह है कि टंकारा में आर्यसमाज की नींव पक्की होती गई ।

श्यामजी भाई ने अपने जीवन में अनेकों को वैदिक धर्म की दीक्षा दी, जो जीवन पर्यन्त चलती रही । सन् १९७० में उनके हाथों आर्यसमाज मन्दिर में दैनिक सत्संग की प्रवृत्ति शुरू हुई, जिससे मानों बालकों-किशोरों को संस्कारित करने का एक अभियान आरम्भ हुआ । गरीब व निम्नवर्ग के ही बच्चें अधिकतर इस सत्संग में श्यामजीभाई की प्रेरणा से आते । श्यामजीभाई में वह गुण था जो इन बच्चो को खिंचकर लाता था । उन बच्चों में से ही अधिकतर बच्चें आज युवा व पौढ़ अवस्था में पहुँच कर आर्यसमाज टंकारा की बागड़ोर संभालते हैं । और दैनिक सत्संग का कार्य आज भी उसी रूप में चल रहा है ।