श्री नानालाल कालिदास टांक

 Aryasamaj

 

आर्यसमाज टंकारा के विकास में जिन महानुभावो का योगदान है; उनमें श्री नानालाल कालिदास टांक का महत्त्व पूर्ण योगदान है । 

आर्यसमाज ने अपना भवन खरीदा और उसमें पुस्तकालय की निर्माण भी किया गया । अनेक प्रकाशकों ने वैदिक व अन्य विषयों का साहित्य भेंट किया । आर्यसमाज ने भी क्रय किया । कुल मिलाकर ३००० (तीन हजार) पुस्तकों का ढेर लग गया । इन पुस्तकों को विषय-भाषा और लेखकों के हिसाब से सप्रमाण विभाजित कर प्रत्येक पर ग्रन्थालय विज्ञान के निमयानुसार क्रमांक डालने का परिश्रम साध्य काम श्री नानालाल जी ने किया । और १४ अलमारियों में उन्हें सुरक्षित रखा । प्रत्येक अलमारी के पुस्तकों की सूची भी सुन्दर अक्षरों से दर्शनीय ढंग से बनाई । इतना ही नहीं पुस्तकालय विज्ञान का सिध्धांत है कि प्रत्येक वाचक को अपनी रूचि के अनुसार पुस्तक मिलें व प्रत्येक पुस्तक को उसका वाचक मिले । श्री नानालाल जी टांक ने यह कार्य भी करके दिखा दिया । वे टंकारा गाँव की गलियों में जाते और पुस्तकों को उनके पाठक तक पहुँचाते और समयसर वापिस लेते या बदली करते ।

स्वयं एक अच्छे चित्रकार थे, अत: आर्यसमाज के सन्यासियों, नेताओं के चित्र (पोट्रेट) नि:शुल्क बनाकर भेंट किया उपर्युक्त दोनों सेवा की याद आज भी आर्यसमाज टंकारा में बनी हुई है ।

पुस्तकों के प्रति इतना प्यार था कि अपनी पवित्र कमाई से एक राशि आर्यसमाज टंकारा को भेंट कर ‘आर्ष साहित्य प्रकाशन निधि’ की स्थापना की ।

आर्यसमाज टंकारा को रसोई घर बनाने की आवश्यकता महसूस हुई तो उसके लिए भी दान देकर अपने त्याग भाव का परिचय दिया ।

श्री नानालाल जी ने आर्यसमाज टंकारा के विभिन्न पदों की जिम्मेदारी निभाई थी ।