सत्संग


परमपिता परमात्मा की श्रेष्ठ कृति मनुष्य है | ईश्वर ने मनुष्य के लिए आवश्यक हर तरह की भौतिक – प्राकृतिक – सुख - सुविधाएँ प्रदान कर दी हैं | और उस का उपयोग किस प्रकार करना है, इस के लिए मनुष्यों को बुद्धि प्रदान कि है | बुद्धि को पोषित करने के लिए परमात्मा ने वेद ज्ञान का प्रकाश कर दिया है | अगर मनुष्य आत्मिक उन्नति करना चाहे; जो की यह उसका जन्मसिद्ध अधिकार है, और जीवन का लक्ष्य भी; तो वह इन साधनों का सदुपयोग कर लक्ष्य प्राप्त कर सकता है | यह सुविधा मनुष्येतर प्राणियों को नहीं मिली | इन साधनों का उपयोग करने का रास्ता बताने के काम दो तरह के हैं | एक है स्वाध्याय और दूसरा है सत्संग |

सत्संग की महिमा हमारे प्राचीन शास्त्रों में बहुत गायी गई हैं | आर्यसमाज ने अपने स्थापना कल से ही इसको अपना महत्त्वपूर्ण अंग माना है | टंकारा में भी जब से आर्यसमाज का प्रारंभ हुआ तब से इस प्रवृत्ति को क्रिया रूप दिया है |

वर्तमान में आर्यसमाज टंकारा की और से दैनिक, साप्ताहिक और पारिवारिक सत्संगों का आयोजन होता है |

 

दैनिक सत्संग :-

वर्तमान काल में चल रहे दैनिक सत्संग का प्रारंभ सन् १९७० में शिवरात्रि से हुआ है | आज तक यह सत्संग नियमित आयोजित होता है | जिसका प्रारंभ श्री श्यामजीभाई आर्य और श्री हसमुख परमार ने मिलकर किया | इस सत्संग की विशेषता यह है कि इस में बाल व किशोर वय के बच्चें विशेषकर शामिल होते हैं | प्राय: यह देखा जाता है कि सत्संगों में बच्चों की रूचि नहीं होती; परन्तु यहाँ ऐसा नहीं है; बच्चे ही यज्ञ आदि की तैयारी करते हैं; स्वयं यज्ञ करते हैं, मन्त्रपाठ (कण्ठस्थ) करते हैं, भजन गाते हैं, श्लोकगान करते हैं, आर्यसमाज के दस नियमों का पाठ करते है | बच्चों को वैदिक सिद्धांतों का ज्ञान भी कराया जाता है | प्रतिदिन सायंकालीन बेला में सूर्यास्त के समय आयोजित होनेवाले इस सत्संग से सेंकडो बच्चे इतने सालों में लाभान्वित हुए हैं, जो आगे चल कर इसी आर्यसमाज की बागड़ोर संभालते हुए नजर आते हैं |

प्रारंभ में उद्ण्ड दिखते बच्चें सत्संग के प्रभाव से संस्कारित हो जाते हैं | प्राय: बच्चे व् युवक अन्यों में दिखती बुरी आदतों की नक़ल करना जल्दी सीख जाते हैं, जिनमें पान-तम्बाकू खाना आदि व्यसनों  से ग्रस्त हो जाना झूठ बोलना, अप्रिय व अपशब्द बोलना, चोरी करना आदि ग़लत मार्ग पर चल पड़ते हैं | यहाँ इस सत्संग का प्रभाव इन बच्चों को किसी भी प्रकार के दुर्व्यसनों से बचने में बहुत मदद करता हैं | बच्चों-युवकों के माता-पिता इससे बहुत खुश होते हैं | अपनी संतानों की स्वास्थ्य हानि नहीं होती और पैसे का अपव्यय भी नहीं होता | अत: खुशी-खुशी से उन्हें सत्संग में भेजते हैं |

 

साप्ताहिक सत्संग :-

आर्यसमाज की स्थापना सही रूप में तब ही मानी जाती हे कि उस समाज के द्वारा साप्ताहिक अधिवेशन का आयोजन होता हों | इस आर्यसमाज के स्थापना काल सन् १९२६ से ही साप्ताहिक अधिवेशन का सञ्चालन होता हैं | प्रति रविवार को सायंकालीन बेला में सम्पन होने वाले इस सत्संग का प्रारंभ बृहद यज्ञ से होता है | श्लोक पाठ, भजन के पश्चात किसी विशेष आर्ष ग्रंथ का वाचन और विवेचन होता है |  विद्वान वक्ता की उपस्थिति हों तो उनका प्रवचन लाभ होता हैं | सामयिक विषय की चर्चा और उससें आर्यसमाज का मंतव्य भी श्रोताजनों का बताया जाता है | कोई विशेष जानकारी आर्यजगत में होनेवाले कार्यक्रम व हलचल व अन्य सूचनाएँ दी जाती हैं | शांतिपाठ व जयघोष  के साथ अधिवेशन को विराम दिया जाता है |

 

पारिवारिक सत्संग  :-

आर्यसमाजी व अन्य परिवारों में होने वाले सामाजिक व अन्य आयोजनों पर आर्यसमाज की और से यज्ञ व सत्संगों का आयोजन होता है | जिसमें सामाजिक विषयों पर प्रकाश डाला जाता है | इस सत्संग की यह विशेषता होती है, कि इसमें सिर्फ यज्ञमान परिवार ही नहीं परन्तु आस-पास के परिवारजन भी उपस्थित रखते हैं और यज्ञ-सत्संग-प्रवचन का लाभ उठाते हैं | और अपने यहाँ इस प्रकार का आयोजन करने का मन बनाते हैं | और अनुकूल समय में आर्यसमाज को सत्संग के लिए निमन्त्रण भी देते हैं |