इतिहास

Itihas - Aryasamaj

 

 

आर्यसमाज कि सर्वप्रथम स्थापना महर्षि दयानन्द ने सन् १८७५ में मुंबई में की | ‌‍‌सन् १८८३ में अपने निर्वाण से पूर्व अनेक नगरों में आर्यसमाजों की स्थापना स्वयं की व प्रेरणा दी | आर्यसमाज एक वैचारिक क्रांति – आंदोलन बन राष्ट्र के सामने प्रकट हुआ | अंग्रेज सरकार ने भी इस क्रान्ति को अपनी सत्ता के भविष्य के लिए चिंतित कर दिया | आर्यसमाज ने शिक्षा संस्थान, अनाथालय, गौशाला आदि से समाज सेवा के कई प्रकल्प आरंभ किये | प्रत्येक वर्ग के लोगों तक इस विचारधारा की सुगंधि पहुँची | परन्तु महर्षि का जन्म प्रान्त गुजरात अछूता-सा रह गया | स्वयं महर्षि भी अपने प्रान्त से दूर रहें, और आर्यसामाज के कार्यकर्ता भी | मुंबई प्रदेश आर्य प्रतिनिधि सभा ने आर्यसमाज के प्रचार के लिए गुजरात में थोड़ा प्रयास किया |

 

विश्व की प्रथम आर्यसमाज की स्थापना के ५० वर्ष बित चुके | सन् १९२५ में महर्षि दयानन्द जन्म शताब्दी मथुरा में मनाई गई | इस समारोह में पूरे देश से आर्यसमाजी - ऋषि भक्त बड़े उत्साह से भाग लेने पहुँचे | जिस में मूल कच्छ (गुजरात) के परन्तु मुंबई में रहनेवाले और आर्यसमाज के रंग से अपने को रंग कर जान न्योछावर करने को उद्यत नव युवक श्री विजयशंकर मूलशंकर जानी और अन्य आर्योंने यह अनुभव किया कि ऋषि दयानन्द तो गुजरात में पैदा हुए थे, जन्म शताब्दी तो ऋषि के जन्म ग्राम टंकारा में भी मनाई जानी चाहिए | मथुरा से लौटकर तुरंत ही अपनी भावना से मुंबई के आर्यों को अवगत कराया | उनके विचार में सबने अपनी हाँ भरी | शिरोमणी सभा से चर्चा हुई | ऋषि कहाँ जन्मे थे, अगर यह जनता को बताना है, तो भव्य समारोह टंकारा में होना ही चाहिए | प्रयास शुरू हुए | समितियाँ बनाई गईं | दिन निश्चित हुए | प्रचार प्रारंभ हुआ | लोगों में भी उत्साह उमड़ पड़ा |

श्री स्वामी श्रद्धानंदजी, स्वामी सर्वदानन्दजी, स्वामी सत्यानन्दजी, महात्मा नारायण स्वामीजी, स्वामी शंकरानन्दजी, महात्मा हंसराजजी, भाई परमानन्दजी, लाला लाजपतरायजी, पं. बालकृष्णजी, पं. अयोध्या प्रसादजी, च. बंसीधरजी विद्यालंकार आदि उपदेशको ; ठा. नत्थासिंहजी व गायनाचार्य मास्टर बसन्त प्रभृति गायकों तथा श्रीमन्त शाहपुरा नरेश, श्रीमन्त गायकवाड नरेश, श्रीमन्त कोल्हापुर नरेश, श्रीमन्त वीरपुर नरेश, श्रीमन्त मोरबी नरेश, श्रीमन्त जामनगर नरेश, श्रीमन्त पोरबंदर नरेश, श्रीमन्त राजकोट नरेश आदि नृपतियो और मी. यादव शिक्षा सचिव मुंबई प्रभृति गण्यमान्य सज्जनो को टंकारा जन्म शताब्दी में पधारने के लिए सानुरोध निमंत्रित किया गया | 

समारोह दिनांक ७ फरवरी से ११ फरवरी १९२६ महाशिवरात्रि पर पाँच दिन भव्यता के साथ मनाया गया | आशातीत सफलता मिली |  यद्यपि यह समारोह बाहर से पधारेने वालोंने टंकारा में आकर मनाया, परंतु अपने पीछे यह एक भारी प्रभाव छोड़ गया | यद्यपि गुजरत का यह काठियावाड (सौराष्ट्र) प्रदेश आर्यसमाज के जन्मदाता ऋषि दयान्द की जन्म भूमि है, तथापि इस महोत्सव से पहेले यहाँ आर्यसमाज के सत्य सिद्धातोंका भारत के अन्य प्रान्तों की अपेक्षा बहुत कम – नहीं के बराबर – प्रचार था | यहाँ के निवासी या तो आर्यसमाज के सिद्धांतों से अपरिचित थे अथवा थोडी बहुत जानकारी थी तो उससे आर्यसमाज को नास्तिक या विधर्मी मानते थे | परंतु इस महोत्सव ने काया पलट दी | यहाँ के कृषकों तथा राजपूतों पर उत्तम प्रभाव पडा | उनके हृदयों में आर्यसमाज के सिद्धांतों व कार्यों के विषय में अनेक शंकाएँ थीं, वह लुप्त हो गइँ | परिणाम स्वरूप टंकारा के साथ – साथ सौराष्ट्र के वढवाण, मोरबी, अमरेली, भावनगर, राजकोट, जामनगर और चुडासमा राजपूतों के आवास स्थान भाल प्रदेश में वैदिक धर्म की ज्योति जग उठी अर्थात् टंकारा जन्म शताब्दी महोत्सवने अज्ञा नता के अंधेरो में डूबे सौराष्ट्र प्रदेश में वैदिक भानु की रश्मियों का प्रकाश फैला दिया |