आर्यसमाज टंकारा की स्थपना

 

शताब्दी महोत्सव में ही यह विचार प्रारंभ हो गया कि स्वामीजी का कोई उपयुक्त स्मारक टंकारा में स्थापित किया जाय | विभिन्न प्रस्ताव आने लगे | अनेक विद्वानों की यह सम्मति थी कि टंकारा ग्राम में ऋषिकी सुन्दर प्रस्तर मूर्ति (स्टेच्यू) स्थापित की जाय | परन्तु इस प्रस्ताव में ‘मूर्तिपूजा’ शुरु हो जाने के भय को देखते हुए अनेक विचारकों ने इस का विरोध किया, तथा उन्होंने टंकारा में गुरुकुल स्थापित करने का प्रस्ताव किया | कुछ महानुभावों की यह सम्मति थी, कि यहाँ संस्कृत पाठशाला स्थापित की जाय | परन्तु अन्त में सर्व सम्मति इस बात में हुई कि ऋषि दयानद के जन्म गृह को खरीद कर उसमें को कोई उपयुक्त संस्था ऋषि स्मारक के रूप में स्थापित की जाय | 

इन विचारों को स्थायी रूप देने के लिए टंकारा निवासियों ने प्रस्ताव रखा कि आर्यसमाज के विचारों से हम बहुत प्रभावित हुए हैं | ऋषि का स्मारक बनाने में हम पूरा सहयोग करेंगे | और यह सारा कार्य टंकारा में  आर्यसमाज की स्थापना करने से संभव हो सकेगा | टंकारा निवासी वैद्यराज चतुर्भुज शिवजी त्रिवेदी व अन्य कार्यकर्ताओंने शताब्दी में पधारे आर्यनेताओं के सामने अपनी इच्छा प्रकट की | फलस्वरूप महोत्सव के अन्तिम दिन अर्थात महाशिवरात्रि १९८२ विक्रमी दिनांक ११ फरवरी १९२६ के दिन श्री स्वामी श्रद्धानन्दजी, श्री महात्मा नारायण स्वामीजी, श्री स्वामी शंकरानन्दजी तथा प्रो. रामदेवजी (आचार्य, गुरुकुल कांगडी) आदि गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति में बडी धूमधाम से आर्यसमाज टंकारा की स्थापना हुई |

आर्यसमाज के क्रन्तिकारी विचारों को आत्मसात कर अपने को धन्य मानने वाले टंकारा में थे तो थोड़े परन्तु आर्य संख्यामें नहीं गिने जाते, भेड-बकरियों के झुण्ड से अपना अलग अस्तित्व स्थापित करते है | इन थोड़े आर्य विचारधारा वालो में से आर्यसमाज टंकारा की प्रथम अंतरंग सभा बनाई गई | जिसमें इस प्रकार पदाधिकारी नियुक्त हुए, प्रधान :- श्री रेवालाल रामचरण, मंत्री श्री चतुभुर्ज शिवजी त्रिवेदी, कोषाध्यक्ष श्री नारणभाई कानजीभाई पीठवा व सदस्य श्री डुंगरशीभाई रामजीभाई सुथार, श्री भलाभाई वशरामभाई गढवी आदि |