प्रारंभिक गतिविधियाँ

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आर्यसमाज का मुख्य कार्य वेद प्रचार है | और वेद प्रचार का मुख्य साधन साप्ताहिक अधिवेशन है | अत: टंकारा में आर्यसमाज द्वारा विभिन्न स्थानों पर साप्ताहिक-पारिवारिक सत्संग शुरू किये गये | यज्ञ, भजन, ऋषि ग्रंथों का स्वाध्याय आदि होने लगे | ‍हालांकि यह प्रारंभिक अवस्था थी, फिर भी प्रचार कार्य क्रान्ति का परिचय देता था ‌‍‌‍‌|‌‍

देश की आर्य जनता में ऋषि जन्म स्थान टंकारा ही है यह प्रतिपाद्य होने से टंकारा सब के लिए श्रद्धा का केन्द्र बन गया | प्रत्येक ऋषि भक्त के मन यह भावना लगी कि एक बार टंकारा जाना चाहिए | जिस धुली में बालक मूलशंकर खेला था, उस धुली का एक बार स्पर्श करना चाहिए, जिस डेमी नदी में मूलशंकर अपने साथियोँ के साथ गोते लगाता होगा, उस नदी ने हम भी एक बार स्नान करके अपने सो धन्य बनायें | उस कुबेरनाथ के शिवालय को देखे, जहाँ से मूलशंकर ने शंकर के मूल (सच्चे ईश्वर) को प्राप्त करने की प्रेरणा ली थी | देश भर से सं न्यासी, वानप्रस्थी, श्रेष्ठी, गुरुकुलों, शिक्षा संस्थानों के संचालक व आम आर्य नरनारी का सिलसिला टंकारा में आना प्रारंभ हो गया | आर्यसमाज टंकारा एक छोटे सी ईकाई थी, नहीं अपना भवन, न कोई आमदनी और कायकर्ता भी बहुत थोड़े थे, पर श्रद्धा भाव से हृदय भरा था | जो भी आता उनका स्वागत् किया जाता | भोजन, आवास और प्रवचन आदि का भी प्रबन्ध होता | जन्म गृह, शिवमन्दिर व टंकारा भ्रमण कराया जाता | दर्शनाथी संतुष्ट होते | इसी क्रम में जुलाई १९२७ में मोगो के प्रसिद्ध नेत्र चिकित्सक डो. मथुरादासजी टंकारा पधारे | उन्होंने यहाँ के आर्यों का उत्साह देखा, टंकारा का वातावरण देखा | सोचा कि टंकारा में आर्यसमाज के द्वारा कुछ प्रवृतियाँ चलाई जा सकती है | तीन प्रवृतियाँ संस्कृत पाठशाला, दयानंद धर्मार्थ औषधालय तथा दयानंद कन्या पुत्री पाठशाला चलाने का प्रत्साव रखा व आर्थिक सहायता का जिम्मा अपने उपर उठाने का आश्वासन दिया | प्रवृतियाँ शुरू हुई | टंकारा निवासियों के लिए ये प्रवृतियाँ आर्यसमाज के प्रति निकटता लाने में सार्थक रहीं | संस्कृत पाठशाला में श्री भवानी शंकर त्रिवेदी अपनी सेवा देते थे | औषधालय का कार्यभार श्री चतुर्भुज शिवजीने संभाला | परंतु कुछ अरसे में ये दोनों प्रवृतियाँ बन्ध हो गई | कन्या पाठशाला मन्दर गति से चलती रही | स्थानीय आर्यों को किसी समयादानी व्यक्ति की आवश्यकता थी | इसी बीच कच्छ निवासी सेठ राघवजी पुरुषोत्तम की प्रेरणा से श्री गिरिधरलाल गोविन्दजी महेता का टंकारा में आगमन हुआ | वह इटोला (वडोदरा के पास) गुरुकुल में सेवारत थे | मस्तिष्क विद्या के विशेषक थे | ऋषि ऋण चुकाने का व्रत लेकर टंकारा को अपनी कर्मभूमि बनाई | कन्या पाठशाला को आपने बड़ी लगन से संभाला, मानों आर्यसमाज टंकारा को एक जीवन दाता मिल गया |

सेठ राघवजी पुरुषोत्तम ने श्री गिरधरलाल जी महेता की शक्ति को पहचाना | टंकारा में एक कन्या ब्रह्मचर्य आश्रम स्थापित करने का सुझाव रखा | श्री गिरधरलालजी महेताने उसे चलाना स्वीकार किया | सेठ राघवजी ने उसका अर्थभार अपने सिर पर उठाया | परिणाम स्वरुप सन् १९३२ में जून मास से श्रीमद् दयानन्द कन्या ब्रह्मचर्य आश्रम की स्थापना हुई | कियाये के मकाने में २० (बीस) कन्या ओं को आवास – भोजन – शिक्षा की नि:शुक्ल सुविधा प्रदान की जाने लगी | इस प्रकार कन्या पुत्री पाठशाला एवं कन्या ब्रह्मचर्य आश्रम दो संस्थाएँ आर्यसमाज टंकारा द्वारा संचालित होने लगी | जिसकी जिम्मेदारी श्री गिरधरलालजी महेता ने उठाई | सन् १९३५  तक ये प्रवृतियाँ सुचारु रूप से चलती रहीं | पश्चात् सेठ राघवजी से प्राप्त आर्थिक सहायता बन्ध होने से ब्रह्मचर्य आश्रम बन्द कर दिया गया | कन्या पुत्री पाठशाला के लिए सेठजी से सहयोग मिलता था, मोरबी स्टेट व टंकारा निवासी श्री डुंगरशीभाई रामजीभाई सुथार से भी आर्थिक अनुदान प्राप्त होता था, वह भी बन्द हो गया; फिर भी डॉ. मथुरादास जी मोगावाले ने अपना अनुदान बन्द नहीं किया | एक मात्र इतने अनुदान से पुत्री पाठशाला चलाना असंभव लगता था, परन्तु इस विपदा की घडी में श्रीमती चंचल बहन पाठक जो की सन् १९३३ से आर्यसमाज की सेवा में टंकारा में अपना जीवन अर्पित करने पधारी थी, ने पुत्री पाठशाला की बागडोर संभाली | स्वयं अध्यापिका का कार्य भी करती थी, आचार्य पदभार भी संभाला, और अवेतन सेवा देकर सन् १९४३ तक कक्षा १ से ७ की कन्याओं के लिए टंकारा का सबसे पहला यह कन्या विद्यालय चलाती रही | व्यवस्था में साथ मिला श्रीमती शान्ताबहन गोरधनदास शाह का | वह भी टंकारा आर्यसमाज की सेवा में अपना जीवन दान करने पधारी थी | इस प्रकार इन ‘त्रिमूर्ति’ श्री गिरधरलाल मेहता, श्रीमती चंचलबहन पाठक व श्रीमती शान्ताबहन शाह ने स्थानीय आर्यों का साथ लेकर टंकारा में आर्यसमाज को गति प्रदान की |

सन् १९४३ में श्रीमंती चंचलबहन पाठक अस्वस्थ हो जाने से पुत्री पाठशाला को आगे चलाना असंभव हो गया | इन्हीं दोनों में मोरबी राज्य ने भी टंकारा में कन्या विद्यालय स्थापित किया, अत: आर्यसमाज टंकारा द्वारा संचालित दयानंद कन्या पुत्री पाठशाला को बन्द कर दिया गया |

 

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